प्रश्न-पत्र में संकलित पाठों में से चार लेखकों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं। जिनमें से एक का उत्तर देना होता है। इस प्रश्न के लिए 3+2=5 अंक निर्धारित हैं।
जीवन परिचय
जीवन-परिचय-प्रभाकर जी का जन्म सन् 1906 ई० में सहारनपुर जिले के देवबन्द कस्बे में, एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता पं० रमादत्त मिश्र पौरोहित्य करते थे, परन्तु उनके विचारों में महानता और व्यक्तित्व में दृढ़ता थी। इनका जीवन अत्यन्त सरल और सात्त्विक था। इनकी माताजी का स्वभाव बड़ा उग्र था। इनकी शिक्षा नगण्य ही हुई। अपनी शिक्षा के विषय में इन्होंने लिखा है कि हिन्दी शिक्षा (सच माने) पहली पुस्तक के दूसरे पाठ ख-ट-म-ल खटमल, ट-म-ट-म टमटम। फिर साधारण संस्कृत। बस हरि ओम्। यानि बाप पढ़े न हम।” जब ये खुर्जा के एक संस्कृत विद्यालय में पढ़ते थे, तब प्रसिद्ध राष्ट्रीय नेता आसफ अली के ओजस्वी भाषण को सुनकर परीक्षा छोड़ दी और स्वतन्त्रता संग्राम में सक्रिय भाग लेने लगे। इसके बाद इन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र-सेवा में लगा दिया। मिश्र जी सन् 1930 ई० से 1932 ई० तक और सन् 1942 ई० में जेल में रहे और राष्ट्र के उच्च नेताओं के सम्पर्क में आये। भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात् इन्होंने अपना जीवन पत्रकारिता में लगा दिया। ये एक सजग पत्रकार थे तथा सहारनपुर से ‘नया जीवन’ और ‘विकास’ नामक मासिक पत्र निकालने के साथ-साथ साहित्य-सृजन में भी संलग्न रहते थे। इनके लेख राष्ट्रीय जीवन के मार्मिक संस्मरणों की सजीव झाँकियाँ हैं, जिसमें भारतीय स्वाधीनता के इतिहास के महत्त्वपूर्ण पृष्ठ भी हैं। 9 मई, 1995 ई० को इस महान् साहित्यकार की मृत्यु हो गयी।
साहित्यिक गतिविधियाँ:- प्रभाकर जी हिन्दी के लघुकथा, रेखाचित्र, संस्मरण, रिपोर्ताज एवं ललित निबन्ध लेखकों में अग्रगण्य हैं। ये भारत की स्वतन्त्रता की लालसा लेकर साहित्य-क्षेत्र में अवतीर्ण हुए। इन्होंने अनेक नयी विधाओं पर फुटकर रचनाएँ कीं और पत्रकारिता के क्षेत्र में अपूर्व सफलता प्राप्त की। इन्होंने पत्रकारिता को स्वार्थ-सिद्धि का साधन न बनाकर महान् मानवीय मूल्यों की स्थापना की। इनकी पत्रकारिता में इनका मानवतावादी दृष्टिकोण देखने को मिलता है। ये एक आदर्श पत्रकार के रूप में हिन्दी जगत् में प्रतिष्ठित हुए। इनके पत्रों में तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक समस्याओं पर इनके निर्भीक और आशावादी विचारों का परिचय मिलता है।
कृतियाँ:- प्रभाकर जी ने हिन्दी की विविध विधाओं में साहित्य-रचना की। इनके अभी तक नौ ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं- रेखाचित्र-‘महके आँगन चहके द्वार’, ‘जिन्दगी मुसकाई’, ‘माटी हो गयी सोना’, ‘भूले-बिसरे चेहरे’। लघुकथा-‘आकाश के तारे’, ‘धरती के फूल’। संस्मरण-‘दीप जले शंख बजे। ललित निबन्ध-‘क्षण बोले कण मुस्काये’, ‘बाजे पायलिया के चुंघरू। सम्पादन-आपने ‘नया जीवन’ तथा ‘विकास’, दो पत्रों का सम्पादन भी किया। इन पत्रों में प्रभाकर जी के सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक समस्याओं पर आशावादी और निर्भीक विचारों का परिचय मिलता है।
लेखक का अतिथि से परिचारक बनना
लेखक कल तक जिनका अतिथि था, आज उनका परिचारक बन गया है, क्योंकि उसकी आतिथेया अचानक बीमार हो गईं और लेखक को उन्हें इन्दौर के राबर्ट नर्सिंग होम में भर्ती कराना पड़ा। नर्सिंग होम में लेखक की मुलाकात महिला नौं मदर मार्गरेट, मदर टेरेजा और क्रिस्ट हैल्ड से होती है।
पीड़ितों के जीवन में हँसी बिखेरती मदर टेरेजा
लेखक अपने बीमार आतिथेया की चिन्ता में डूबा था। उसी समय राबर्ट नर्सिंग होम की अध्यक्षा मदर टेरेजा ने प्रवेश किया। उन्होंने एक माँ के समान रोगी के परिजनों को निर्देश दिया कि रोगी के पास निराश और दु:खी चेहरा लेकर नहीं जाना चाहिए। साथ ही मदर (जो माँ के समान भावनाओं को अपने चेहरे एवं गतिविधियों में समाहित किए हुए थी) ने रोगी के दोनों गालों पर अपने गोरे हाथ थपथपाए, तब रोगी के चेहरे पर एक मुसकान आ गई। इस प्रकार माँ के समान दिखने वाली नर्स ने लेखक के चेहरे पर हँसी ला दी, तभी डॉक्टर ने कमरे में प्रवेश किया और मदर टेरेजा से कहा कि तुम रोगियों में हँसी बिखेरती हो।
मदर टेरेजा और क्रिस्ट हैल्ड साथ-साथ
फ्रांस की रहने वाली मदर टेरेजा और जर्मनी की रहने वाली क्रिस्ट हैल्ड, दोनों के रूप, रस, ध्येय (उद्देश्य) सब एक जैसे लग रहे थे। दोनों में कहीं से भी असमानता नजर नहीं आ रही थी। लेखक को यह जानने की अत्यधिक उत्सुकता हुई कि जर्मनी के हिटलर ने फ्रांस को तबाह कर दिया था। दोनों एक-दूसरे के शत्रु देश बन गए थे, लेकिन यहाँ तो शत्रु देश की नसों के बीच मित्रता का अद्भुत संगम दिख रहा था। इसी दौरान लेखक को यह अहसास हुआ कि ये दोनों महिला नसें विरोधी देशों की होने के बावजूद एक हैं। उन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता।
भेदभाव की दीवारें मनुष्य द्वारा निर्मित
लेखक को मदर टेरेजा एवं क्रिस्ट हैल्ड के अनुभव से अहसास हुआ कि वास्तव में धर्म, जाति. राष्ट. वर्ग आदि को आधार बनाकर मनुष्य-मनुष्य के बीच भेदभाव करने वाले वास्तव में मनुष्य ही है। मनुष्य ही अपने संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति के लिए भेदभाव की भिन्न-भिन्न दीवारें खड़ी करता है।
क्रिस्ट हैल्ड और लेखक के मध्य वार्तालाप
क्रिस्ट हैल्ड ने पाँच वर्षों के लिए सेवा करने का व्रत लिया है। वह रोगी के काले घने बाल देखकर अपने पिता की यादों में खो जाती है। लेखक को लगता है कि जैसे वह स्वयं क्रिस्ट हैल्ड है, जो अपने माता-पिता से हजारों मील दूर एक अनजान देश में बिलकुल अकेला है, यह सोचकर उसकी आँखों में आँसू आ गए। क्रिस्ट हैल्ड लेखक के आँसुओं को रूमाल से पौंछती है। लेखक उससे पूछता है कि अपना घर छोड़ने के बाद तुम रोई थीं? वह भोले स्वर में कहती है, नहीं परन्तु माँ बहुत रोई थी। लेखक को आश्चर्य होता है, वह अकसर हिन्दी, अंग्रेजी, जर्मन भाषाओं के शब्द मिलाकर बोलती है। जब लेखक ने उसे बिस्किट भेंट किए तो वह धन्यवाद, बैंक यू, तांग शू बोलकर हँसती-हँसती वहाँ से चली गई। .
मदर टेरेजा द्वारा पूजा-गृहों के सम्मेलन की चर्चा
लेखक मदर टेरेजा से प्रश्न करता है कि अपने घर से आने के बाद क्या आप कभी घर नहीं गई। इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने एक कहानी सुनाई। कई वर्ष पहले फ्रांस में विश्व भर के पूजा-गृहों का सम्मेलन हुआ है। भारत की दो मदर भी प्रतिनिधि बनकर उस सम्मेलन में गई थीं वे दोनों फ्रांस की ही थीं। उनके माता-पिता फ्रांस में ही थे। उन्हें पता था कि उनकी बेटियाँ आ रही हैं। जब दोनों माताएँ अपनी बेटियों का स्वागत करने आईं तो वे अपनी बेटियों को पहचान नहीं पाईं और एक-दूसरे से पूछने लगीं, तुम्हारी बेटी कौन-सी है? अन्त में उनका नाम पूछकर उन्हें गले से लगाया। कहानी पूरी होते ही मदर टेरेजा वहाँ से उठकर चली गई, क्योंकि उनमें से एक न पहचाने जाने वाली बेटी वे स्वयं ही थीं।
मदर टेरेजा के आत्म त्याग की भावना का परिचय
मदर टेरेजा रोगियों के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित थीं। वह असह्य रोगियों की सेवा किया करती थीं। उन्होंने इस जगत् में मानवता के लिए स्वयं को अर्पित कर दिया था। वह पीड़ित व्यक्तियों के लिए प्रार्थना आदि भी किया करती थीं। उन्होंने अपना प्यार अधिक दुःखी व्यक्ति के लिए समर्पित कर दिया था।
वृद्ध मदर मार्गरेट का सेवा भाव तथा जादुई व्यक्तित्व
लेखक वृद्ध मदर मार्गरेट के सेवा भाव से बहुत प्रभावित हुआ। उसने उनके जादुई व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए उन्हें गुड़िया कहा और साथ ही स्पष्ट किया कि उनकी चाल चुस्त और व्यवहार मस्त था। वह रोगियों से मुसकराते हुए बात करती थीं। उनको देखकर व्यक्ति के मन का दु:ख दूर हो जाता था। इस मानव सेवा में वे ऐसी आनन्दमग्न थीं कि उसके सामने उन्हें जीवन की कोई भी इच्छा तुच्छ (छोटी) दिखाई देती थीं
परोपकार एवं मानवीयता की भावना को चरितार्थ करना
लेखक कहना चाहता है कि राबर्ट नर्सिंग होम की महिला नर्से जिस आत्मीयता, ममता, स्नेह, सहानुभूति की भावना से रोगियों की सेवा कर रही हैं, वह सचमुच सभी के लिए अनुकरणीय हैं। हम भारतीय तो गीता को पढ़ते हैं, समझते हैं और याद रखते हैं। इतना करके ही हम अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं, लेकिन ये महिला नर्से तो उस गीता के सार को अपने जीवन में उतारती हैं। सच में ये धन्य हैं, ये मानव जाति के उज्ज्वल पक्ष हैं।
( गद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर)
प्रश्न-पत्र में पद्म भाग से दो गद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर: देने होंगे।
प्रश्न 1. नश्तर तेज था, चुभन गहरी पर मदर का कलेजा उससे अछूता रहा। बोली, “हिटलर बुरा था, उसने लड़ाई छेड़ी, पर उससे इस लड़की का भी घर ढह गया और मेरा भी; हम दोनों एक।” ‘हम दोनों एक मदर टेरेजा ने झूम में इतने गहरे डूब कर कहा कि जैसे मैं उनसे उनकी लड़की को छीन रहा था और उन्होंने पहले ही दाँव में मुझे चारों खाने दे मारा। मदर चली गईं, मैं सोचता रहा: मनुष्य-मनुष्य के बीच मनुष्य ने ही कितनी दीवारें खड़ी की हैं-ऊँची दीवारें, मजबूत फौलादी दीवारें, भूगोल की दीवारें, जाति-वर्ग की दीवारें, कितनी मनहूस, कितनी नगण्य, पर कितनी अजेया मैंने बहुतों को रूप से पाते देखा था, बहुतों को धन से और गुणों से भी बहुतों को पाते देखा था, पर मानवता के आँगन में समर्पण और प्राप्ति का यह अद्भुत सौम्य स्वरूप आज अपनी ही आँखों देखा कि कोई अपनी पीड़ा से किसी को पाए और किसी का उत्सर्ग सदा किसी की पीड़ा के लिए ही सुरक्षित रहे।
01 प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है तथा इसके लेखक कौन हैं?
उत्तर: प्रस्तुत गद्यांश ‘राबर्ट नर्सिंग होम’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ हैं।
02 मनुष्य ने मनुष्य के बीच किस प्रकार की दीवारें खड़ी की है ?
उत्तर: मनुष्य ने मनुष्य को लड़ाने के लिए जाति, धर्म, वर्ग तथा भौगोलिक सीमा आदि- की दीवारें खड़ी की हैं। ये दीवारें इतनी सूक्ष्म हैं कि इन पर विजय पाना अब मनुष्य की सामर्थ्य में भी नहीं है।
03 लेखक ने व्यक्तियों को किन कारणों से प्रसिद्धि प्राप्त करते हुए देखा है?
उत्तर: लेखक ने अनेक व्यक्तियों को अपने रूप-सौन्दर्य, आर्थिक सम्पन्नता तथा सद्गुणों एवं सद्व्यवहार के कारण प्रसिद्धि प्राप्त करते हुए देखा है।
04 प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से हमें क्या सन्देश मिलता है?
उत्तर: प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने मदर टेरेसा के मानवतावादी दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए हमें सन्देश दिया है कि हमें उदार मन, सद्भावना एवं निःस्वार्थ भाव से मानव सेवा करनी चाहिए।
05 जिसे जीता न जा सके वाक्यांश के लिए एक शब्द लिखिए।
उत्तर: ‘जिसे जीता न जा सके’ वाक्यांश के लिए एक शब्द ‘अजेय’ है।
प्रश्न 2. आदमियों को मक्खी बनाने वाला कामरूप का जादू नहीं, मक्खियों को आदमी बनाने वाला जीवन का जादू-होम की सबसे बुढ़िया मदर मार्गरेटा कद इतना नाटा कि उन्हें गुड़िया कहा जा सके, पर उनकी चाल में गजब की चुस्ती, कदम में फुती और व्यवहार में मस्ती, हँसी उनकी यों कि मोतियों की बोरी खुल पड़ी और काम यों कि मशीन मात माने। भारत में चालीस वर्षों से सेवा में रसलीन, जैसे और कुछ उन्हें जीवन में अब जानना भी तो नहीं।
01 मदर मार्गरेट कौन थीं? लेखक ने उनके व्यक्तित्व का वर्णन किस रूप में किया?
उत्तर: मदर मार्गरेट राबर्ट नर्सिंग होम की सबसे वृद्ध मदर थीं। उनका कद एक गुड़िया की भाँति छोटा था। वे व्यवहार में खुशमिजाज एवं फुर्तीली स्वभाव की थीं।
02 लेखक ने नर्सिंग होम की मदर मार्गरेट को जादूगरनी क्यों कहा है?
उत्तर: मदर मार्गरेट अपनी ममता, सेवा भावना से एक दीन-हीन निराश रोगी के जीवन में आशा का संचार करके उन्हें स्वस्थ, हँसता-खेलता व्यक्ति बना देती थीं। इसलिए लेखक ने मदर मार्गरेट को जादूगरनी कहा है।
03 ‘जैसे और कुछ उन्हें जीवन में सब जानना भी तो नहीं।’ से लेखक का । क्या आशय है?
उत्तर: लेखक स्पष्ट करता है कि मदर मार्गरेट अपना कार्य एकाग्र एवं मग्न होकर करती थीं कि जीवन में वह अब किसी और वस्तु को प्राप्त करना ही नहीं चाहतीं। वे इस सेवा के अतिरिक्त किसी अन्य विषय में सोचना व जानना भी नहीं चाहती।
04 प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने क्या अभिव्यक्त किया है?
उत्तर: प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने मदर मार्गरेट की सेवा भावना तथा उनके चमत्कारिक व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए उनके परोपकारी चरित्र की अभिव्यक्ति की है। लेखक ने इसी के साथ उनके नि:स्वार्थ भाव से । मान-सेवा के गुण को भी उजागर करने का सफल प्रयास किया है।
05 ‘जीवन’, ‘फुर्ती शब्दों के विलोम शब्द लिखिए।
उत्तर: जीवन – मृत्यु, फुर्ती – सुस्ती।
कृपया अपना स्नेह बनाये रखें ।
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