पाठ 7 : हम और हमारा आदर्श

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ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ


प्रश्न-पत्र में संकलित पाठों में से चार लेखकों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं। जिनमें से एक का उत्तर देना होता है। इस प्रश्न के लिए 3+2=5 अंक निर्धारित हैं।

जीवन परिचय

भारत रत्न अबुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम अर्थात् ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर, 1931 को धनुषकोडी गाँव, रामेश्वरम, तमिलनाडु में हुआ था। इनके पिता का नाम जैनुलाब्दीन था, जो मछुवारों को किराए पर नाव दिया करते थे। कलाम जी की आरम्भिक शिक्षा रामेश्वरम में ही पंचायत प्राथमिक विद्यालय में हुई, इसके पश्चात् इन्होंने मद्रास इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से अन्तरिक्ष विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। स्नातक होने के पश्चात् इन्होंने हायराफ्ट परियोजना पर काम करने के लिए भारतीय रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संस्थान में प्रवेश किया। वर्ष 1962 में भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन में आने के पश्चात् इन्होंने कई परियोजनाओं में निदेशक की भूमिका निभाई। इन्होंने एस. एल. बी. 3 के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया, इसी कारण इन्हें मिसाइल मैन भी कहा गया। इसरो के निदेशक पद से सेवानिवृत्त होने के पश्चात्, ये वर्ष 2002 से 2007 तक भारत के राष्ट्रपति पद पर आसीन रहे, जिसके पश्चात् इन्होंने विभिन्न विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में अध्यापन कार्य किया। अपने अन्तिम क्षणों में भी ये शिलांग में प्रबन्धन संस्थान में पढ़ा रहे थे। वहीं पढ़ाते हुए 27 जुलाई, 2015 में इनका निधन हो गया। इन्हें विभिन्न विश्वविद्यालयों से मानद (मान-प्रतिष्ठा देने वाला) उपाधियों प्राप्त होने के साथ-साथ भारत सरकार द्वारा वर्ष 1981 व 1990 में क्रमशः पद्म भूषण व पद्म विभूषण से तथा 1997 से भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

साहित्यिक गतिविधियाँ:- वकलाम जी ने अपनी रचनाओं के द्वारा विद्यार्थियों में युवाओं को जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है। इन्होंने अपने विचारों को विभिन्न पुस्तकों में समाहित किया है।

कृतियाँ:-इण्डिया 2020, ए विजन फॉर द न्यू मिलेनियम, माई जर्नी, इग्नाइटेड माइण्डस, विंग्स ऑफ फायर, भारत की आवाज, टर्निग प्लॉइण्टेज, हम होंगे कामयाब इत्यादि।



पाठ का सारांश


नागरिकों में समृद्ध राष्ट्र की इच्छा होना

‘हम और हमारा आदर्श’ अध्याय में कलाम जी ने राष्ट्र की प्रगति के लिए स्वयं लोगों द्वारा सुख-सुविधाओं से युक्त जीवन जीने की इच्छा रखने और पूर्ण करने हेतु हदय से प्रयास करने के लिए कहा है। साथ ही वे भौतिकता व आध्यात्मिकता को परस्पर एक दूसरे का पूरक भी सिद्ध करने का प्रयास करते हैं।

प्रगति के लिए स्वयं के महत्त्व को पहचानना

लेखक कलाम जी स्वयं की युवा छात्रों से मिलने की प्रवृत्ति पर विचार करते हुए, स्वयं के रामेश्वरम द्वीप से निकलकर जीवन में प्राप्त की गई अपनी उपलब्धियों पर आश्चर्य प्रकट करते हैं। इन उपलब्धियों के मूल में वे अपनी महत्त्वाकांक्षा की प्रवृत्ति पर विचार-विमर्श करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उनके द्वारा समाज के प्रति दिए गए योगदान के अनुसार अपना मूल्यांकन करना ही महत्त्वपूर्ण था।
वे कहते हैं कि मनुष्य को ईश्वर प्रदत्त सभी वस्तुओं का उपभोग करने का अधिकार है और जब तक मनुष्य के भीतर स्वयं समृद्ध भारत में जीने की इच्छा एवं विश्वास नहीं होगा, वह अच्छा नागरिक नहीं बन सकता। विकसित अर्थात् जी-8 देशों के नागरिकों का समृद्ध राष्ट्र में जीने का विश्वास ही उनके विकास का रहस्य हैं।

जीवन में भौतिक वस्तुओं का महत्त्व

कलाम जी भौतिकता और आध्यात्मिकता को न तो एक-दूसरे का विरोधी मानते हैं। और न ही भौतिकतावादी मानसिकता को गलत। वे स्वयं अपना उदाहरण देते हुए न्यूनतम वस्तुओं का उपभोग करने की अपनी प्रवृत्ति के विषय में बताते हैं और कहते हैं कि समृद्धि मनुष्य में सुरक्षा व विश्वास के भाव को संचारित करती है, जो उनमें स्वतन्त्र होने के भाव को पैदा करती है। कलाम जी ब्रह्माण्ड का व बगीचे में खिले फूलों का उदाहरण देते हुए प्रकृति द्वारा प्रत्येक कार्य को पूर्णता से करने के गुण को उद्धारित करते हैं। वे महर्षि अरविन्द द्वारा प्रत्येक वस्तु को ऊर्जा का अंश मानने का उदाहरण देते हुए कहते है कि आत्मा व पदार्थ सभी का अस्तित्व शीनों परस्पर जुड़े हुए हैं। अतः भौतिकता कोई बुरी चीज नहीं है।

स्वेच्छा पूर्ण कार्य ही आनन्द का साधन

कलाम जी कहते हैं कि भौतिकता को सदैव निम्न स्तरीय माना गया है और न्यूनतम में जीवन व्यतीत करने को श्रेयस्कर कहा जाता है। वे कहते हैं कि स्वयं गाँधी जी ने ऐसा जीवन व्यतीत किया, क्योंकि यह उनकी इच्छा थी। मनुष्य को सदैव अपने भीतर से उपजी इलाओं के अनुरूप जीवन शैली को अपनाना चाहिए, अनावश्यक रूप से त्याग की प्रतिमूर्ति बनने का प्रयास नहीं करना चाहिए। वे कहते हैं कि युवा छात्रों से मिलने का मूल उद्देश्य उन्हें इसी गुण से परिचित कराते हुए उन्हें सुख-सुविधाओं से पूर्ण जीवन के सपने देखने और उन्हें पूर्ण करने के लिए शुद्ध भाव से प्रयास करने के लिए प्रेरित करना है। ऐसा करने के उपरान्त ही वे अपने चारों ओर खुशियों का प्रसार कर पाएँगे।



( गद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर)

प्रश्न-पत्र में पद्म भाग से दो गद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर: देने होंगे।

प्रश्न 1. मैं खासतौर से युवा छात्रों से ही क्यों मिलता हूँ? इस सवाल का जवाब तलाशते हुए मैं अपने छात्र जीवन के दिनों के बारे में सोचने लगा। रामेश्वरम के द्वीप से बाहर निकलकर यह कितनी लम्बी यात्रा रही। पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो विश्वास नहीं होता। आखिर वह क्या था, जिसके कारण यह सम्भव हो सका? महत्त्वाकांक्षा? कई बातें मेरे दिमाग में आती हैं। मेरा ख्याल है कि सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि मैंने अपने योगदान के मुताबिक ही अपना मूल्य आँका। बुनियादी बात जो आपको समझनी चाहिए, वह यह है कि आप जीवन की अच्छी चीजों को पाने का हक रखते हैं, उनका जो ईश्वर की दी हुई हैं। जब तक हमारे विद्यार्थियों और युवाओं को यह भरोसा नहीं होगा कि वे विकसित भारत के नागरिक बनने के योग्य हैं, तब तक वे जिम्मेदार और ज्ञानवान नागरिक भी कैसे बन सकेंगे। विकसित देशों की समृद्धि के पीछे कोई रहस्य नहीं छिपा है। ऐतिहासिक तथ्य बस इतना है कि इन राष्ट्रों, जिन्हें जी-8 के नाम से पुकारा जाता है, के लोगों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस विश्वास को पुख्ता किया कि मजबूत और समृद्ध देश में उन्हें अच्छा जीवन बिताना है। तब सच्चाई उनकी आकांक्षाओं के अनुरूप ढल गई।

01 लेखक अपने छात्र जीवन के विषय में क्यों सोचने लगता है?

उत्तर: लेखक को युवा छात्रों से मिलना, उनसे बातें करना अत्यधिक रुचिकर लगता था। वह स्वयं की युवा छात्रों से मिलने की प्रवृत्ति पर प्रश्न अंकित करता है कि उसे यह क्यों अच्छा लगता है? और इसी प्रश्न का उत्तर ढूंढते हुए वह अपने छात्र जीवन के विषय में सोचने लगता है।

02 लेखक के अनुसार मनुष्य जीवन में बड़ा बनने का मूल कारण क्या है?

उत्तर: कलाम जी के अनुसार, मनुष्य का जीवन में बड़ा बनने का मूल कारण उसकी महत्त्वाकांक्षा है। मनुष्य महत्त्वाकांक्षा के बल पर ही अपने जीवन में आगे बढ़ पाता है।

03 किसी राष्ट्र के युवा कब तक राष्ट्र की उन्नति में अपनी भूमिका नहीं निभा सकते?

उत्तर: किसी राष्ट्र के नागरिकों, विशेष रूप से युवाओं व विद्यार्थियों में जब तक यह विश्वास नहीं होगा कि वे स्वयं विकसित राष्ट्र के नागरिक बनने के योग्य हैं, तब तक वे राष्ट्र के विकास एवं उन्नति में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा सकते, क्योंकि राष्ट्र के विकास के लिए उन्हें स्वयं जिम्मेदारियों को उठाते हुए अपना योगदान देना होगा।

04 लेखक के अनुसार विकसित देशों की समृद्धि के पीछे क्या तथ्य है?

उत्तर: लेखक के अनुसार विकसित देशों की समृद्धि के पीछे कोई रहस्य नहीं छिपा, अपितु इसके पीछे छिपा ऐतिहासिक तथ्य यह है कि इन देशों के नागरिक समृद्ध राष्ट्र में जीने का विश्वास रखते हैं।

05 ‘महत्त्वाकांक्षा एवं विद्यार्थी शब्दों का सन्धि-विच्छेद करते हुए सन्धि का नाम भी लिखिए।

उत्तर: महत्त्व + आकांक्षा = महत्त्वाकांक्षा (दीर्घ सन्धि)
विद्या + अर्थी = विद्यार्थी (दीर्घ सन्धि)



प्रश्न 2. न्यूनतम में गुजारा करने और जीवन बिताने में भी निश्चित रूप से कोई हर्ज नहीं है। महात्मा गाँधी ने ऐसा ही जीवन जिया था, लेकिन जैसा कि उनके साथ था, आपके मामले में भी यह आपकी पसन्द पर निर्भर करता है। आपकी ऐसी जीवन-शैली इसलिए है, क्योंकि इससे वे तमाम जरूरतें पूरी होती हैं, जो आपके भीतर की गहराइयों से उपजी होती हैं, लेकिन त्याग की प्रतिमूर्ति बनना और जोर-जबरदस्ती से चुनने-सहने का गुणगान करना अलग बातें हैं।


01 लेखक के अनुसार किस प्रकार का जीवन व्यतीत करने में परेशानी नहीं है?

उत्तर: लेखक स्पष्ट करते हैं कि भौतिकता को सदैव निम्न स्तरीय माना गया और न्यूनतम में जीवन व्यतीत करने को श्रेयस्कर कहा जाता है अर्थात् यदि हमें कम में भी जीवन व्यतीत करने को कहा जाए, तो इसमें कोई परेशानी नहीं है।

02 लेखक महात्मा गाँधी के जीवन का उदाहरण देकर क्या स्पष्ट करना चाहता है ?

उत्तर: लेखक महात्मा गाँधी के जीवन का उदाहरण देकर यह स्पष्ट करना चाहता है। कि प्रत्येक मनुष्य को अपनी इच्छानुसार जीवन व्यतीत करना चाहिए। उन्हें दूसरों के समक्ष आदर्श प्रस्तुत करने हेतु इच्छा के विपरीत त्याग की प्रतिमूर्ति नहीं बनना चाहिए।

03 मनुष्य को सदैव किस प्रकार की जीवन-शैली को अपनाना चाहिए?

उत्तर: मनुष्य को सदैव अपनी इच्छानुसार जीवन व्यतीत करना चाहिए, क्योंकि इससे हमारी वे सारी जरूरतें पूरी होती हैं, जो स्वयं हमारे अन्तर्मन की गहराइयों से निःसृत होती हैं अर्थात् मनुष्य को सदैव अपनी इच्छाओं के अनुरूप जीवन-शैली को अपनाना चाहिए। अनावश्यक रूप से त्याग करने का प्रयास ठीक नहीं होता।

04 प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक क्या सन्देश देना चाहता है?

उत्तर: प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक भौतिकता या भौतिकता रहित जीवन दोनों में से किसी एक को महत्व न देकर यह सन्देश देना चाहते हैं कि हमें अपनी इच्छानुसार जीवन व्यतीत करना चाहिए।

05 ‘हर्ज’ एवं ‘तमाम’ शब्दों का पर्यायवाची लिखिए।

उत्तर: हर्ज - हानि, नुकसान; तमाम - सारा, सम्पूर्ण







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